जोनी एरिक्सन टाडा (Joni Eareckson Tada): दुःख में परमेश्वर के उद्देश्य पर भरोसा करना

📖 पवित्रशास्त्र का आधार

बाइबल संदर्भ: 2 कुरिन्थियों 12:9
“उस ने मुझ से कहा, मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ निर्बलता में सिद्ध होती है।” (ओ.वी.)

🌿 जब पीड़ा शिक्षक बन जाती है

दुःख अक्सर विश्वासियों के मन में यह प्रश्न उत्पन्न करता है कि परमेश्वर अपने विश्वासयोग्य लोगों के जीवन में कठिनाइयों को क्यों आने देता है। शारीरिक निर्बलता, अनुत्तरित प्रश्न और अचानक होने वाली हानियाँ दृढ़ विश्वास की भी परीक्षा ले सकती हैं। फिर भी पवित्रशास्त्र बार-बार सिखाता है कि परमेश्वर परीक्षाओं के द्वारा अपने उद्देश्यों को पूरा करता है। जब हम ज्ञान से समझ और फिर बुद्धि की ओर बढ़ते हैं, तब हम अनुभव करते हैं कि उसका अनुग्रह हमारे लिए पर्याप्त है। यही सत्य जोनी एरिक्सन टाडा के जीवन में अद्भुत रीति से प्रकट हुआ।

📜 परमेश्वर का पाठ आरम्भ होता है

सन् 1967 में, सत्रह वर्षीय जोनी एरिक्सन (Joni Eareckson) एक गोता लगाने की दुर्घटना में गर्दन से नीचे तक लकवाग्रस्त हो गईं। एक सक्रिय और उत्साही युवती का जीवन अचानक पूरी तरह बदल गया। शारीरिक स्वतंत्रता के खो जाने से उनके जीवन में गहरा दुःख, निराशा और परमेश्वर की इच्छा से जुड़े अनेक कठिन प्रश्न उत्पन्न हुए। उन प्रारम्भिक वर्षों में विश्वासयोग्य विश्वासियों की संगति, पवित्रशास्त्र का गंभीर अध्ययन और कलीसिया की प्रेमपूर्ण देखभाल ने उन्हें निराशा में डूबने के बजाय प्रभु यीशु मसीह की ओर देखते रहने में सहायता दी। उन्हें तुरंत सभी उत्तर नहीं मिले, परन्तु धीरे-धीरे उन्होंने यह बाइबिलीय सत्य सीखा कि परमेश्वर का सर्वोच्च अधिकार दुःख के समय में भी बना रहता है। रोमियों 8:28 और भजन संहिता 139 जैसे वचनों ने उन्हें स्मरण दिलाया कि प्रभु की योजनाएँ कभी आकस्मिक नहीं होतीं। उनका ज्ञान इस सत्य से प्रारम्भ हुआ कि परमेश्वर का स्वभाव सदैव भला है, चाहे उसके मार्ग हमारी समझ से परे ही क्यों न हों।

🔥 परीक्षा में परमेश्वर का अनुग्रह

प्रभु ने जोनी की शारीरिक स्थिति को नहीं बदला, परन्तु उसी परिस्थिति में वह विश्वासयोग्यता से कार्य करता रहा। प्रार्थना, प्रतिदिन पवित्रशास्त्र पर मनन, और वर्षों तक प्रभु यीशु पर भरोसा करना सीखने के द्वारा उनकी समझ गहरी होती गई। उन्होंने जाना कि दुःख परमेश्वर की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं, बल्कि उसकी उपस्थिति का अनुभव करने का अवसर है। 2 कुरिन्थियों 12 ने उन्हें सिखाया कि परमेश्वर की सामर्थ मनुष्य की निर्बलता में सबसे अधिक प्रकट होती है। जैसे-जैसे उनका विश्वास परिपक्व हुआ, कटुता कृतज्ञता में बदल गई और आत्म-दया ने मसीह पर आनन्दपूर्ण निर्भरता का स्थान ले लिया। परमेश्वर ने सेवकाई के ऐसे द्वार भी खोले जिनकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। लेखन, संदेश देने, चित्रकला और दिव्यांग परिवारों को प्रोत्साहित करने के द्वारा प्रभु ने दिखाया कि विश्वासयोग्य सेवा शारीरिक सामर्थ पर नहीं, बल्कि उसके प्रति समर्पित हृदय पर आधारित होती है। इस प्रकार परमेश्वर ने व्यक्तिगत दुःख को अपने अनुग्रह की गवाही बना दिया और असंख्य विश्वासियों को यह स्मरण दिलाया कि उसकी योजनाएँ सदैव हमारी योजनाओं से अधिक बुद्धिमानीपूर्ण होती हैं।

🌟 वह बुद्धि जो मसीह के लिए जीती है

जो सत्य जोनी ने सीखा, वही उनके जीवन का आधार बन गया। उन्होंने अपनी पहचान अपनी सीमाओं से नहीं, बल्कि मसीह की पर्याप्तता से प्राप्त की। जोनी एंड फ्रेंड्स की सेवकाई के द्वारा परमेश्वर ने अनेक कलीसियाओं को दिव्यांग लोगों की सेवा करने और अनेक देशों में सुसमाचार सुनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका जीवन यह दिखाता है कि बाइबिल की बुद्धि कठिनाइयों से बच निकलने में नहीं, बल्कि उन्हीं परिस्थितियों में परमेश्वर की आज्ञा मानते हुए विश्वासयोग्य बने रहने में है। यद्यपि उनकी शारीरिक चुनौतियाँ बनी रहीं, फिर भी परमेश्वर का अनुग्रह निरन्तर उन्हें सम्भालता रहा और उनके जीवन में धीरज, करुणा, नम्रता और स्थायी आशा उत्पन्न करता रहा। एक पूर्णतः समर्पित जीवन इस सत्य की जीवित गवाही बन गया कि हर परिस्थिति में मसीह पर भरोसा किया जा सकता है।

🔗 स्रोत

https://joniandfriends.org/about/our-history/

✨ आत्मिक मनन

परमेश्वर यह प्रतिज्ञा नहीं करता कि हर परीक्षा समाप्त हो जाएगी, परन्तु वह अपनी विश्वासयोग्य उपस्थिति का वचन अवश्य देता है (यशायाह 41:10)। जोनी की तरह, जब विश्वासी अपनी परिस्थितियों के बजाय पवित्रशास्त्र को अपने दृष्टिकोण का आधार बनाते हैं, तब वे आत्मिक रूप से बढ़ते हैं। जिन परिस्थितियों को हम कभी नहीं चुनते, उन्हीं के द्वारा प्रभु अक्सर हमारे जीवन में अपना सबसे गहरा कार्य करता है। विश्वासयोग्य धीरज की प्रत्येक गवाही अन्ततः मनुष्य के साहस की नहीं, बल्कि प्रभु यीशु मसीह की ओर संकेत करती है, जिन्होंने दुःख उठाया, क्रूस पर प्राण दिए, और पुनरुत्थान के द्वारा अपने लोगों को अनन्त आशा तथा प्रत्येक परीक्षा में सामर्थ प्रदान की।

💙 अन्तिम प्रोत्साहन

यदि आज आप किसी कठिनाई से होकर गुजर रहे हैं, तो स्मरण रखें कि प्रभु यीशु ने आपको नहीं भुलाया है। उसके वचन पर भरोसा रखें, आज्ञाकारिता में स्थिर बने रहें, और विश्वास करें कि उसका अनुग्रह प्रतिदिन आपको सम्भाले रखेगा।

🙏 प्रार्थना

हे स्वर्गीय पिता, जब मैं दुःखों का सामना करूँ, तब मेरे विश्वास को दृढ़ कर। मुझे तेरी बुद्धि पर भरोसा करना, तेरे वचन का पालन करना, धीरज से स्थिर रहना, और प्रतिदिन प्रभु यीशु मसीह के पर्याप्त अनुग्रह में विश्राम करना सिखा। आमीन।


Comments

Leave a comment