अस्वीकार किया गया पुत्र: दाख की बारी के दृष्टान्त का अर्थ

📖 ✝️ पवित्रशास्त्र पाठ : मत्ती 21:33–46

“परमेश्वर के विरुद्ध सबसे बड़ा विद्रोह यह है कि हम उसके पुत्र को अस्वीकार करें।”

— ऑसवाल्ड चैम्बर्स (Oswald Chambers)

💒 🕊️ ✨ पृष्ठभूमि (कहानी) :

यरूशलेम तनाव से भरा हुआ था।

कुछ ही दिन पहले प्रभु यीशु मसीह नगर में प्रवेश कर चुके थे। जिस दिन को आज मसीही लोग खजूर रविवार कहते हैं, उस दिन भीड़ ने “होशाना” पुकारते हुए उनका स्वागत किया था। फसह का समय था और नगर तीर्थयात्रियों से भरा हुआ था। रोमी सैनिक हर जगह निगरानी कर रहे थे। यहूदी महायाजक, शास्त्री और पुरनिये पहले से ही प्रभु यीशु के बढ़ते प्रभाव से परेशान थे।

उन्होंने मंदिर को शुद्ध किया था। उन्होंने खुले रूप से धार्मिक अगुवों के अधिकार को चुनौती दी थी। अब वे फिर से मंदिर के आँगन में खड़े होकर लोगों को शिक्षा दे रहे थे, और बहुत से लोग उनकी बातें सुनने के लिए इकट्ठे थे।

तभी प्रभु यीशु ने एक कहानी सुनानी शुरू की।

परन्तु यह केवल एक कहानी नहीं थी। यह एक ऐसा दृष्टान्त था जो इस्राएल के अगुवों के हृदय को उजागर करने वाला था।

प्रभु यीशु ने कहा कि एक गृहस्थ ने एक दाख की बारी लगाई। उसने उसे चारों ओर से बाड़ा लगाया, उसमें रस निकालने के लिए हौद खोदा, और एक मीनार भी बनाई। फिर उसने उस दाख की बारी को किसानों को ठेके पर देकर स्वयं परदेश चला गया।

उस समय के सुनने वाले इस चित्र को तुरंत समझ सकते थे। प्राचीन इस्राएल में दाख की बारियाँ सामान्य थीं, और किसानों को ठेके पर भूमि देना भी प्रचलित व्यवस्था थी, विशेषकर रोमी शासन के समय।

परन्तु इस कहानी के पीछे एक और गहरा अर्थ था।

यह चित्र पुराने नियम की उस भविष्यवाणी की याद दिलाता है जो यशायाह की पुस्तक में मिलती है। यशायाह 5 में इस्राएल को परमेश्वर की दाख की बारी कहा गया है। धार्मिक अगुवे इस पवित्रशास्त्र को भलीभाँति जानते थे।

दृष्टान्त में जब फल लेने का समय आया, तो उस गृहस्थ ने अपने दासों को भेजा कि वे किसानों से उसका फल ले आएँ।

परन्तु किसानों ने उनका सम्मान नहीं किया।

उन्होंने एक दास को पीटा, दूसरे को मार डाला, और तीसरे को पत्थरों से घायल किया।

फिर उस गृहस्थ ने पहले से अधिक दास भेजे। परन्तु उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार किया गया।

कहानी सुनने वाले लोगों के मन में तनाव बढ़ता जा रहा था।

यहाँ “दास” के लिए जो यूनानी शब्द प्रयुक्त हुआ है वह है “दूलोस (doulos)”, जिसका अर्थ है स्वामी के अधीन सेवक या दूत। यह उन भविष्यद्वक्ताओं का प्रतीक है जिन्हें परमेश्वर ने इस्राएल के पास भेजा था।

इतिहास में कई भविष्यद्वक्ताओं को अस्वीकार किया गया। यशायाह, यिर्मयाह और जकर्याह जैसे परमेश्वर के सेवकों को लोगों ने सताया और उनकी बातें नहीं मानीं।

फिर कहानी अपने चरम पर पहुँचती है।

अन्त में उस गृहस्थ ने अपने पुत्र को भेजा।

उसने सोचा, “वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे।”

परन्तु जब किसानों ने पुत्र को देखा तो उन्होंने आपस में कहा, “यह तो वारिस है। आओ, हम इसे मार डालें और इसकी संपत्ति पर अधिकार कर लें।”

और उन्होंने उसे पकड़कर दाख की बारी से बाहर निकाल दिया और मार डाला।

जब प्रभु यीशु यह बात कह रहे थे, तब बहुत से लोगों को समझ आने लगा होगा कि इस दृष्टान्त का अर्थ क्या है।

पुत्र स्वयं प्रभु यीशु मसीह को दर्शाता था।

दाख की बारी परमेश्वर के राज्य के कार्य और इस्राएल का प्रतीक थी।

और किसान वे धार्मिक अगुवे थे जिन्हें आत्मिक जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

तब प्रभु यीशु ने लोगों से पूछा, “जब उस दाख की बारी का स्वामी आएगा तो वह उन किसानों के साथ क्या करेगा?”

लोगों ने उत्तर दिया, “वह उन दुष्टों का बुरा नाश करेगा और दाख की बारी को ऐसे किसानों को दे देगा जो समय पर उसे फल देंगे।”

तब प्रभु यीशु ने एक गहरी सच्चाई प्रकट की।

उन्होंने भजन संहिता (Psalms) 118:22 का उल्लेख करते हुए कहा,

“जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने निकम्मा ठहराया वही कोने का सिरा हो गया।”

यहाँ “निकम्मा ठहराया” के लिए यूनानी शब्द “अपेदोकीमासान (apedokimasan)” प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ है किसी वस्तु को ध्यान से परखकर जानबूझकर अस्वीकार करना।

धार्मिक अगुवों ने प्रभु यीशु को परखा, परन्तु उन्हें स्वीकार करने के स्थान पर अस्वीकार कर दिया।

फिर भी परमेश्वर उनकी योजना को बदलने वाला था। जिस पत्थर को अस्वीकार किया गया वही कोने का सिरा बनने वाला था।

प्रभु यीशु ने यह भी कहा कि परमेश्वर का राज्य उनसे ले लिया जाएगा जो उसे अस्वीकार करते हैं और उन्हें दिया जाएगा जो उसके फल उत्पन्न करेंगे।

यह सुनकर धार्मिक अगुवों को समझ आ गया कि प्रभु यीशु यह बात उनके विषय में कह रहे हैं।

वे उसी समय उन्हें पकड़ना चाहते थे, परन्तु भीड़ से डरते थे क्योंकि लोग उन्हें भविष्यद्वक्ता मानते थे।

अब प्रभु यीशु और धार्मिक अगुवों के बीच का संघर्ष निर्णायक स्थिति पर पहुँच चुका था।

यह दृष्टान्त केवल शिक्षा नहीं था; यह आने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी भी था।

कुछ ही दिनों में वही अगुवे परमेश्वर के पुत्र को अस्वीकार करेंगे और उन्हें क्रूस पर चढ़ाने के लिए सौंप देंगे।

🤔 🪞 💡 आत्मिक मनन  :
यह दृष्टान्त परमेश्वर के धैर्य और मनुष्य के कठोर हृदय को प्रकट करता है।

इतिहास में बार-बार परमेश्वर ने अपने लोगों को बुलाया। उसने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, चेतावनी दी, और उन्हें अपने पास लौटने का अवसर दिया।

फिर भी लोगों ने बार-बार उसका विरोध किया।

जब गृहस्थ ने अपने पुत्र को भेजा, तो यह उसके प्रेम का सर्वोच्च प्रमाण था।

आत्मिक रूप से यह उस महान सत्य को प्रकट करता है कि परमेश्वर ने संसार के उद्धार के लिए अपने पुत्र को भेजा।

इस दृष्टान्त की सबसे दुखद बात यह है कि किसानों ने पुत्र को पहचान लिया था, फिर भी उन्होंने उसे मार डालने का निश्चय किया।

यह हमें बताता है कि मनुष्य का हृदय कितना कठोर हो सकता है।

यह घटना प्रभु यीशु के चरित्र को भी प्रकट करती है। वे जानते थे कि उनके साथ क्या होने वाला है, फिर भी वे सत्य को स्पष्ट रूप से बताते हैं।

धर्मशास्त्र के अनुसार परमेश्वर इस संसार का स्वामी है। मनुष्य केवल उसके प्रबंधक हैं।

परन्तु इस दृष्टान्त में एक आशा भी छिपी हुई है।

जिस पत्थर को लोगों ने अस्वीकार किया वही कोने का सिरा बन गया।

मनुष्यों ने प्रभु यीशु को अस्वीकार किया, परन्तु परमेश्वर ने उन्हें पुनरुत्थान के द्वारा महिमा दी और उन्हें उद्धार का आधार बना दिया।

 🎬🔛 ऐतिहासिक सत्य घटना :

रिचर्ड वुर्मब्रांड का साहसिक विश्वास – रोमानिया, 1948

सन 1948 में रोमानिया (Romania) में पास्टर रिचर्ड वुर्मब्रांड (Richard Wurmbrand) को एक कठिन निर्णय का सामना करना पड़ा।

उस समय की साम्यवादी सरकार ने चर्च के अगुवों से कहा कि वे सरकार का समर्थन करें और मसीह के सुसमाचार को चुप कर दें।

कुछ धार्मिक अगुवों ने अपने पद और सुरक्षा बचाने के लिए ऐसा किया।

परन्तु रिचर्ड वुर्मब्रांड ने मना कर दिया।

बुखारेस्ट (Bucharest) में एक बड़ी सभा में जब सरकार की प्रशंसा की जा रही थी, तब उन्होंने खड़े होकर साहस से कहा कि चर्च को केवल प्रभु यीशु मसीह के प्रति विश्वासयोग्य रहना चाहिए।

इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

चौदह वर्षों तक उन्होंने कारागार में यातनाएँ और कठिनाइयाँ सहन कीं, फिर भी वे अपने साथी कैदियों को गुप्त रूप से प्रभु यीशु के बारे में बताते रहे।

रिहा होने के बाद भी उन्होंने संसार भर में जाकर सुसमाचार का प्रचार किया और सताए गए मसीहियों की सहायता के लिए सेवा शुरू की।

🔗 स्रोत :

https://www.persecution.com/richard-wurmbrand/

⚒️🎯 व्यक्तिगत लागू करने की बात :

यह दृष्टान्त हमें अपने जीवन की जाँच करने के लिए बुलाता है। कई बार हम भी परमेश्वर की आशीषों का आनंद लेते हैं, परन्तु उसके अधिकार को स्वीकार नहीं करते। हम जीवन को अपना समझते हैं जबकि वास्तव में वह परमेश्वर का है। प्रभु यीशु हमें याद दिलाते हैं कि परमेश्वर हमारे जीवन का स्वामी है और वह हमसे आत्मिक फल चाहता है—विश्वास, पश्चाताप, नम्रता और प्रेम। जब हम प्रभु यीशु मसीह को अपने जीवन का कोने का सिरा मानते हैं, तब हमारा जीवन परमेश्वर के राज्य के अनुसार बदलने लगता है।

🙏 🕯️प्रार्थना:

हे प्रभु यीशु, आप हमारे विश्वास के कोने का सिरा हैं। जब हम आपके अधिकार को अस्वीकार करते हैं तो हमें क्षमा करें। हमारे जीवन में ऐसा फल उत्पन्न करें जो आपको प्रसन्न करे। हमें साहस दें कि हम हर परिस्थिति में आपके प्रति विश्वासयोग्य रहें।आमीन।


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