जब स्मृतियों पर दया ने जय पाई: कॉरी टेन बूम और क्षमा का बढ़ा हुआ हाथ

सन् 1947 था। यूरोप अब भी घायल और टूटा हुआ था। गिरजाघरों की दीवारें खड़ी थीं, परन्तु मनुष्यों के हृदय पत्थरों से भी अधिक टूटे हुए थे। म्यूनिख, जर्मनी के एक छोटे से गिरजे में एक स्त्री लोगों के सामने खड़ी होकर धीरे-धीरे, परन्तु दृढ़ता से, क्षमा के विषय में बोल रही थी। उसका नाम कॉरी टेन बूम था।

उस सभा में उपस्थित बहुत से लोग उसके अतीत को नहीं जानते थे।

कुछ ही वर्ष पहले, कॉरी हॉलम, हॉलैंड में अपने परिवार की घड़ी की दुकान के ऊपर बने एक साधारण घर में रहती थी। जब नाज़ी शासन ने सारे देश में भय फैला दिया, तब कॉरी और उसके परिवार ने सुरक्षा के स्थान पर परमेश्वर की आज्ञा मानना चुना। उन्होंने उन यहूदी परिवारों के लिए अपने घर के द्वार खोल दिए जो पकड़े जाने से भाग रहे थे। कॉरी के शयनकक्ष में एक झूठी दीवार के पीछे — जो आगे चलकर “हाइडिंग प्लेस” कहलाया — पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को शरण मिली। उन संकुचित और मौन घंटों में, सैकड़ों जीवन बचाए गए।

परन्तु विश्वासघात हुआ।

सन् 1944 में, टेन बूम परिवार को गेस्टापो ने पकड़ लिया। कॉरी, उसकी बहन बेट्सी, और उनके वृद्ध पिता को बन्दी बना लिया गया। उनके पिता थोड़े ही समय बाद जेल में मर गए। कॉरी और बेट्सी को रैवेन्सब्रुक यातना-शिविर भेज दिया गया — एक ऐसा स्थान जो मनुष्य से गरिमा, आशा और विश्वास छीन लेने के लिए बनाया गया था।

वहाँ कॉरी ने अपनी बहन को दुःख उठाते देखा — पीटी जाती, ठट्ठों में उड़ाई जाती, भूख से तड़पती। फिर भी उस अन्धकार में बेट्सी ऐसे वचन कहती थी जो असम्भव से प्रतीत होते थे:

“ऐसा कोई गड्ढा नहीं है जो इतना गहरा हो कि परमेश्वर का प्रेम उससे भी गहरा न हो।”

सन् दिसम्बर 1944 में बेट्सी की मृत्यु उसी शिविर में हो गई। कॉरी जीवित बच गई — एक लेखा-जोखा की भूल के कारण — एक ऐसी भूल जिसने उसका जीवन बचा लिया।

युद्ध के बाद, कॉरी चुप होकर नहीं बैठी। वह सारे यूरोप में घूम-घूमकर अपनी गवाही देने लगी — दोष लगाने के लिए नहीं, परन्तु यह बताने के लिए कि क्षमा ही वह सामर्थ्य है जो टूटे हुए संसार को चंगा कर सकती है।

और उसी विश्वास की परीक्षा म्यूनिख में हुई।

जब कॉरी अपना संदेश समाप्त कर चुकी, तब उसने देखा कि एक व्यक्ति उसकी ओर बढ़ रहा है। उसका हृदय थम-सा गया। वह उसे पहचान गई — रैवेन्सब्रुक का एक पूर्व एस.एस. प्रहरी। अब उसका चेहरा बूढ़ा हो चुका था, वर्दी के स्थान पर कोट और टाई थी, परन्तु स्मृतियाँ बाढ़ की नाईं उमड़ पड़ीं। बैरकें। अपमान। क्रूरता। और वह घड़ी जब उसकी प्रिय बहन की साँसें थम गई थीं।

वह व्यक्ति उसके सामने आकर रुक गया।

उसने कहा कि वह अब मसीही बन गया है। उसने परमेश्वर की क्षमा के विषय में कहा। फिर धीरे से बोला कि वह कॉरी से क्षमा सुनना चाहता है। और उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

कॉरी का मन चिल्ला उठा — नहीं। उसका हृदय जकड़ गया। क्षमा असम्भव लग रही थी। उसकी बहन मर चुकी थी। घाव वास्तविक थे। न्याय ने पीड़ा को मिटाया नहीं था।

तब कॉरी ने प्रार्थना की — न तो सुन्दर शब्दों में, न ही आत्मविश्वास से — परन्तु टूटे हुए मन से।

और फिर, अनुग्रह से सँभाले हुए एक निर्णय द्वारा, उसने अपना हाथ उठाया और उसका हाथ थाम लिया।

बाद में उसने लिखा कि ऐसा लगा मानो उसके कंधे से होकर, उसकी बाँह के द्वारा, उनके जुड़े हुए हाथों में एक सामर्थ्य की धारा बह गई हो। उसके भीतर गर्माहट भर गई। घृणा की पकड़ ढीली पड़ गई। उस क्षण, क्षमा केवल आज्ञा न रहकर — एक चमत्कार बन गई।

उसने उसके अतीत को उचित नहीं ठहराया। उसने न्याय को अस्वीकार नहीं किया। उसने दोनों को परमेश्वर के हाथों में सौंप दिया।

उस साधारण से हाथ मिलाने में, रैवेन्सब्रुक की शक्ति टूट गई।

जिस शिविर ने उसकी बहन को छीन लिया था, वह उसकी आत्मा को न छीन सका। स्मृति पर दया ने जय पाई। घृणा पर अनुग्रह ने विजय पाई। और सुसमाचार सिद्ध हुआ — केवल सत्य ही नहीं, परन्तु जीवित।

“क्षमा करना एक बन्दी को स्वतंत्र करना है, और यह जान लेना कि वह बन्दी तुम स्वयं थे।” — कॉरी टेन बूम

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https://christianhistoryinstitute.org/magazine/article/ch-150-living-for-christ