Exodus 15:22–27
“तब वे एलीम को आए, जहाँ पानी के बारह सोते और सत्तर खजूर के पेड़ थे; और वहाँ उन्होंने जल के पास डेरे खड़े किए।”
निर्गमन 15:27 HINOVBSI
“परमेश्वर का विश्राम शान्ति से आता है, परन्तु गहराई से सिद्ध करता है।”
— रोवन एम. हार्ट
सन् 1944 में, विश्वयुद्ध के समय, कोरी टेन बूम और उनकी बहन बेट्सी को रावन्सब्रुक नामक छावनी में बन्द कर दिया गया। वहाँ की दशाएँ अत्यन्त कठोर थीं—ठंड, भूख, रोग, और निराशा। बेट्सी विटामिन की कमी से बहुत निर्बल हो गई थी। उनके पास केवल एक छोटा सा द्रव-विटामिन का बोतल था, जो लगभग खाली ही लगती थी।
प्रतिदिन कोरी उस बोतल को झुकाकर बेट्सी को एक बूँद देती थीं। फिर अन्य बीमार स्त्रियाँ भी पंक्ति में खड़ी होने लगीं। कोरी के मन में संघर्ष उठा:
“यह बोतल आज ही समाप्त हो जाएगी। सबको कैसे दूँ?”
इस्राएलियों ने अभी-अभी गम्भीर परीक्षा को पार किया था। लाल समुद्र सूखी भूमि पर पार करने का चमत्कार अभी ताज़ा ही था, पर कुछ ही दिनों में उनकी स्तुति सूखती रेत में कराह में बदल गई। पानी नहीं था। मराह पहुँचे, तो जल कड़वा था—पीने योग्य नहीं। उनकी आशा टूट गई।
परन्तु परमेश्वर ने वहाँ हस्तक्षेप किया—जल को चंगा किया और स्वयं को यहोवा-राफा के रूप में प्रकट किया।
पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
मराह के बाद लिखा है—“तब वे एलिम में आए।”
एलिम कोई चमत्कार का स्थान नहीं था—यह परमेश्वर की पूर्व-तैयार की हुई विश्रामभूमि थी।
• बारह सोते—हर गोत्र के लिए एक।
• सत्तर खजूर—छाया, ताज़गी, सामर्थ्य का प्रतीक।
• शान्त, स्थिर विश्राम—कोई बादल, कोई गर्जना, कोई चिन्ह नहीं; केवल परमेश्वर की दयालु व्यवस्था।
इस्राएल मराह में रो रहे थे, पर वे नहीं जानते थे कि एलिम पहले से ही उनका इंतज़ार कर रहा था।
उनकी प्यास शुरू होने से पहले ही परमेश्वर ने सोते तैयार कर दिए थे।
उनकी थकान आने से पहले ही खजूर उग रहे थे।
एलिम हमें सिखाता है कि परमेश्वर की व्यवस्था हमेशा समय पर होती है—चाहे वह शांत और साधारण क्यों न लगे।

एलिम हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर हमारे टूटने के क्षणों को समझता है। परीक्षा के बाद वह हमें चुपचाप पुनर्स्थापन के स्थान पर ले आता है। एलिम नाम सामर्थ्य की ओर संकेत करता है—छाया, ताज़गी, और विश्राम।
मारा — परीक्षा का स्थान।
एलिम — पुनःस्थापन का स्थान।
मारा में परमेश्वर सिखाता है।
एलिम में परमेश्वर विश्राम देता है।
कई बार हम महाचमत्कार खोजते हैं, परन्तु परमेश्वर हमें छोटे-छोटे क्षण देता है—एक सोता, थोड़ी छाया, एक आवश्यक विराम, एक उत्साहवर्धक बातचीत, एक अप्रत्याशित सहायता। ये साधारण प्रतीत होते हैं, परन्तु परमेश्वर की ही उपलब्धि हैं।
एलिम यह घोषणा है कि हर कड़वे स्थान के बाद एक नियोजित आशीष होती है।
हम उसे पहले से नहीं देखते, पर परमेश्वर सोते पहले ही तैयार कर चुका होता है।
कहानी का अन्त:
बेट्सी ने आग्रह किया,“कोरी, इसे सबके साथ बाँट दो। प्रभु देगा।”
तो कोरी ने बीमार स्त्रियों को बूँद-बूँद देकर बाटना शुरू किया। दर्जनों को दी। फिर औरों ने माँगा। दिन बीत गए। सप्ताह बीत गए। हर बार बोतल झुकाई—एक बूँद निकल आती।
कोरी ने लिखा,
“मैं बोतल को रोशनी में देखती—लगभग खाली। पर हर बार उसमें से थोड़ा और निकल आता।”
जब अचानक उन्हें बाहर से असली विटामिन मिले—उसी दिन बोतल खाली हो गई।
कोरी ने निष्कर्ष लिखा—
“परमेश्वर ने उसे उतना ही बढ़ाया, जितनी देर आवश्यकता थी।”

जैसे इस्राएल एलिम में पहुँचे—परमेश्वर ने चुपचाप, स्थिर, पर पर्याप्त व्यवस्था दी।
हम प्रायः मारा में रोते हैं—अपनी निराशाओं, विलम्बों, और परीक्षाओं में—और सोचते हैं कि परमेश्वर क्यों चुप है। परन्तु यदि हम उसके मार्ग में चलते रहें, तो वह सदैव हमें हमारे एलिम तक पहुँचाता है।
जब हम थके हों, हमें स्मरण रखना चाहिए—
• परमेश्वर जानता है कब परीक्षा देनी है और कब विश्राम।
• हमारे लिए सोते पहले से तैयार हैं—हम बस वहाँ पहुँचे नहीं हैं।
• कड़वे स्थान स्थायी नहीं होते; हम वहाँ डेरा नहीं करते—हम आगे बढ़ते हैं।
आओ हम विश्वास से चलें, यह मानते हुए कि जो परमेश्वर मारा में चंगा करता है, वही एलिम में ताज़गी भी देता है।
🙏 प्रार्थना:
“हे प्रभु, उन एलिमों के लिये धन्यवाद, जिन्हें तू पहले से हमारे लिये तैयार करता है। हमें परीक्षा में सामर्थ्य दे, विश्राम में नया करे, और सिखा कि तेरी समयसारिणी सिद्ध और उत्तम है। हमें कड़वाहट से आशीष की ओर ले चल। आमीन।”

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