जब परमेश्वर सूखे मार्गों से ले चलता है

📖 निर्गमन 15:22–24
“तब मूसा ने इस्राएल को लाल समुद्र से चलाया, और वे शूर के जंगल में आए; और तीन दिन जंगल में चलकर जल न पाया। फिर वे मारा में आए, पर मारा का जल पीने योग्य न था, क्योंकि वह कड़वा था; इस कारण उसका नाम मारा कहा गया।”


“विश्वास भी मांसपेशी के समान है — वह सहने से बलवान होता है।”

— ए. डब्ल्यू. टोज़र

सन् 1873 में, शिकागो के एक मसीही वकील और व्यापारी होरेशियो गेट्स स्पैफ़र्ड अपने जीवन के सबसे कठिन समय से गुज़र रहे थे। दो वर्ष पहले शिकागो की बड़ी आग (1871) ने उनका अधिकांश व्यवसाय जला डाला था।अभी वे उस हानि से उबर ही रहे थे कि उनके चार वर्षीय पुत्र की मृत्यु हो गई।

अपने दुखी परिवार को विश्राम देने के लिए उन्होंने यूरोप यात्रा की योजना बनाई। उन्होंने अपनी पत्नी अन्ना और चार बेटियों को जहाज़ “विले डू हाव्रे (Ville du Havre)” में पहले भेज दिया, और स्वयं बाद में जाने का निश्चय किया।

परंतु 22 नवम्बर, 1873 को वह जहाज़ अटलांटिक महासागर में एक अन्य जहाज़ से टकराकर सिर्फ 12 मिनट में डूब गया।

200 से अधिक लोग मारे गए — जिनमें उनकी चारों बेटियाँ भी थीं।

कुछ दिनों बाद अन्ना जीवित बचीं और वेल्स से एक छोटा संदेश भेजा:

“Saved alone” — “केवल मैं बची।”

इस्राएलियों ने अभी-अभी परमेश्वर को लाल समुद्र फाड़ते देखा था — यह ऐसा चमत्कार था जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे। वे गीत गा रहे थे, जयजयकार कर रहे थे, परमेश्वर की सामर्थ्य का गुणगान कर रहे थे।

पर केवल तीन दिन बाद, वही लोग जो स्तुति कर रहे थे, अब कुड़कुड़ाने लगे। वही परमेश्वर जिसने उन्हें विजय दी थी, अब उन्हें एक ऐसे जंगल में ले चला जहाँ जल भी न था।

कल्पना कीजिए — तेज धूप, सूखे होंठ, प्यास से रोते बच्चे, निराश चेहरों पर धूल और थकावट। और जब उन्हें अंततः जल मिला, तो वह पीने योग्य न था — कड़वा था।

उनकी खुशी पलभर में बुझ गई।

पर यह त्याग नहीं था, यह परीक्षा थी।

परमेश्वर उन्हें सिखा रहा था कि पहाड़ की चोटी पर मिली विजय के बाद घाटी में भी विश्वास बनाए रखना है।

वह उनका छुड़ानेवाला होना बंद नहीं कर चुका था। वह उन्हें दिखा रहा था कि उसकी व्यवस्था केवल शक्ति के चमत्कारों तक सीमित नहीं — वह उनकी प्यास, उनकी परीक्षा और उनके भरोसे के क्षणों में भी कार्य करती है।

एक ऐसे जंगल में ले चला जहाँ जल भी न था।

कभी-कभी परमेश्वर हमें सूखे स्थानों से ले चलता है — हमें दुख देने के लिए नहीं, पर हमारे मन को यह सिखाने के लिए कि जब आशीषें छिपी सी लगें, तब भी वह विश्वासयोग्य है।

कहानी का अन्त:

जब स्पैफ़र्ड अपनी शोकग्रस्त पत्नी से मिलने समुद्र पार कर रहे थे, तब जहाज़ के कप्तान ने उन्हें बुलाया और कहा,

“यही वह स्थान है जहाँ आपकी पुत्रियाँ डूबी थीं।”

वहीं डेक पर खड़े होकर — उस गहरे दुःख के बीच — स्पैफ़र्ड ने परमेश्वर की शांति को अनुभव किया जो हर समझ से परे थी।

उसी क्षण उन्होंने वह शब्द लिखे जो आज भी संसार भर में गाए जाते हैं:

“When peace like a river attendeth my way,

When sorrows like sea billows roll;

Whatever my lot, Thou hast taught me to say,

It is well, it is well with my soul.”

“जब शान्ति नदी-सी मेरी राह में बहती है,

जब दुख समुद्र की लहरों-से उमड़ते हैं;

जो कुछ भी मेरा भाग्य हो, तूने मुझे यह कहना सिखाया है

सब भला है, सब भला है, मेरी आत्मा के साथ।”

जिस समुद्र ने उनके लिए कड़वा शोक लाया था, उसी में से परमेश्वर ने अनन्त शान्ति की धारा बहा दी। वह कड़वाहट जो असहनीय थी, कृपा से मधुर बन गई।

कभी–कभी हम “सूखे” मौसमों से होकर गुजरते हैं — ऐसे दिन जब प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं मिलता, वादे देर से पूरे होते हैं, और परमेश्वर मानो मौन और दूर लगते हैं। परन्तु इन सब के बीच हम यह सीखते हैं कि मौन का अर्थ अनुपस्थिति नहीं होता।

इस्राएल की तरह हम भी अक्सर यह समझते हैं कि वही परमेश्वर, जिसने लाल समुद्र को खोला था, आज भी हमें मरुभूमि के रास्तों पर मार्ग दिखा रहा है।

जब जीवन सूना और बंजर लगता है, तो परमेश्वर हमें दण्ड नहीं दे रहा होता — वह हमें तैयार कर रहा होता है। हर “मरुभूमि का मौसम” हमारे विश्वास को और मज़बूत करता है और हमें यह सिखाता है कि हम अपनी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि उसके वचन पर भरोसा रखें।

🙏 प्रार्थना:

हे पिता, जब मार्ग सूखा और कठिन लगे,

तब मुझे तुझ पर भरोसा रखना सिखा।

मेरे “मारा” के जल को तेरी कृपा से मधुर कर दे।

तेरे उद्देश्य को मेरे wilderness में प्रकट कर।

आमीन।