📖 पवित्रशास्त्र की नींव
बाइबल संदर्भ: याकूब 1:5
“यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी।”
🌅 बदलते समय में परमेश्वर की बुद्धि की खोज
हर पीढ़ी नए प्रश्नों, बदलती हुई संस्कृति और नई चुनौतियों का सामना करती है। ऐसे समय में विश्वासी या तो परिवर्तन से डर सकते हैं या परमेश्वर से बुद्धि माँगकर विश्वासयोग्यता से उत्तर दे सकते हैं। पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है कि सच्चा विवेक मनुष्य की बुद्धि से नहीं, बल्कि प्रभु से प्राप्त होता है। सन् 1974 के लॉज़ेन सम्मेलन में जॉन स्टॉट (John Stott) की सेवकाई का इतिहास दिखाता है कि परमेश्वर अपने लोगों को अपने समय को समझने की सामर्थ्य देता है, जबकि वे उसके अटल वचन में दृढ़ बने रहते हैं।
📜 परमेश्वर अपने वचन और अपनी कलीसिया के द्वारा सिखाता है
सन् 1970 के दशक के प्रारम्भ तक अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक भागों में मसीही विश्वास तेजी से बढ़ रहा था, जबकि संसार के अन्य क्षेत्रों में कलीसियाएँ बढ़ते हुए धर्मनिरपेक्ष प्रभाव और सांस्कृतिक परिवर्तनों का सामना कर रही थीं। इन अवसरों और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, बिली ग्राहम (Billy Graham) ने जुलाई 1974 में स्विट्ज़रलैंड (Switzerland) के लॉज़ेन (Lausanne) नगर में विश्व प्रचार के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। 150 से अधिक देशों से लगभग 2,700 सुसमाचारवादी मसीही अगुवे एकत्र हुए ताकि बाइबल आधारित एकता और मसीह के मिशन के प्रति नए समर्पण की खोज करें। परमेश्वर पहले ही जॉन स्टॉट को वर्षों की विश्वासयोग्य पासबानी, बाइबल शिक्षा और धर्मवैचारिक मनन के द्वारा तैयार कर चुका था। बदलते विचारों पर भरोसा करने के बजाय, स्टॉट ने सीखा था कि पवित्रशास्त्र ही कलीसिया का अंतिम अधिकार है। यही विश्वास उनकी सेवा की नींव बना। परमेश्वर ने उन्हें यह गहरा सत्य सिखाया कि प्रत्येक पीढ़ी को संसार को परमेश्वर के वचन के प्रकाश में समझना चाहिए और कभी भी संस्कृति को बाइबल के सत्य का स्थान नहीं लेने देना चाहिए।
🙏 परमेश्वर नम्र सेवा के द्वारा समझ को गहरा करता है
लॉज़ेन सम्मेलन के दौरान जॉन स्टॉट ने लॉज़ेन वाचा (Lausanne Covenant) के प्रारूप तैयार करने वाली समिति के मुख्य संयोजक और अध्यक्ष के रूप में सेवा की। उन्होंने अपने विचारों को आगे बढ़ाने के बजाय, विभिन्न देशों और सेवकाइयों से आए प्रतिनिधियों के सुझावों को प्रार्थनापूर्वक सुना और एक अंतरराष्ट्रीय दल के साथ मिलकर कार्य किया। परिणामस्वरूप तैयार हुई लॉज़ेन वाचा ने पवित्रशास्त्र के अधिकार, सुसमाचार की केन्द्रीयता, महान आदेश और संसार में मसीह के प्रेम को व्यवहार में दिखाने की मसीही जिम्मेदारी की पुष्टि की। परमेश्वर ने इस सहयोगी प्रक्रिया के द्वारा दिखाया कि बाइबल की सच्ची समझ नम्रता, प्रार्थना, ध्यानपूर्वक सुनने और उसके वचन के अधीन रहने से बढ़ती है। स्टॉट ने समझ लिया कि विश्वासयोग्य मिशन के लिए बाइबल के सत्य के प्रति अटल निष्ठा और बदलती हुई दुनिया के प्रति करुणामय सहभागिता—दोनों आवश्यक हैं। उनकी समझ सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करने से नहीं, बल्कि प्रत्येक चुनौती को पवित्रशास्त्र के प्रकाश में देखने से गहरी होती गई।

🌿 विश्वासयोग्य अगुवाई में प्रकट हुई बुद्धि
लॉज़ेन वाचा आधुनिक युग के सबसे प्रभावशाली सुसमाचारवादी मिशन दस्तावेज़ों में से एक बन गई। इसने संसार भर के विश्वासियों को प्रत्येक पीढ़ी में विश्वासयोग्यता से प्रभु यीशु मसीह का प्रचार करने और बाइबल आधारित करुणा के साथ लोगों की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित किया। जॉन स्टॉट ने लगातार लोगों का ध्यान अपनी ओर नहीं, बल्कि मसीह की ओर लगाया और अपनी प्रतिष्ठा से अधिक पवित्रशास्त्र की आज्ञाकारिता पर बल दिया। उनकी सेवकाई ने यह दिखाया कि सच्ची बुद्धि नम्रता, स्पष्टता और प्रेम के साथ परमेश्वर के सत्य को जीवन में उतारने में है। परमेश्वर ने उनके समर्पित जीवन के द्वारा कलीसियाओं को दृढ़ किया, बाइबल आधारित चेलापन को बढ़ावा दिया और सुसमाचार के प्रचार के लिए वैश्विक सहयोग को प्रेरित किया।
🔗 स्रोत
https://lausanne.org/occasional-paper/lop-3
✨ आत्मिक मनन
जॉन स्टॉट का जीवन हमें स्मरण दिलाता है कि संसार बदल सकता है, परन्तु परमेश्वर कभी नहीं बदलता। विश्वासियों को बुलाया गया है कि वे प्रत्येक विचार को पवित्रशास्त्र की कसौटी पर परखें (प्रेरितों के काम 17:11), ऊपर से आने वाली बुद्धि को खोजें (याकूब 3:17), और प्रभु यीशु मसीह के महान आदेश के प्रति विश्वासयोग्य बने रहें (मत्ती 28:19–20)। सच्चा विवेक प्रार्थना, पवित्र आत्मा पर नम्र निर्भरता और परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता से बढ़ता है। प्रत्येक विश्वासयोग्य सेवक अंततः मनुष्य की नहीं, बल्कि प्रभु यीशु मसीह की ओर संकेत करता है, जो “परमेश्वर की बुद्धि” हैं (1 कुरिन्थियों 1:24) और प्रत्येक पीढ़ी के अपरिवर्तनीय प्रभु हैं।
🌟 अंतिम प्रोत्साहन
आज आपके चारों ओर चाहे कितने भी परिवर्तन क्यों न हों, परमेश्वर के वचन को अपनी अटल नींव बनाए रखें। उससे बुद्धि माँगें, साहस के साथ मसीह के पीछे चलें और विश्वासयोग्यता से सेवा करें। जिस प्रभु ने हर पीढ़ी में अपनी कलीसिया की अगुवाई की है, वही आपको भी नम्र आज्ञाकारिता में मार्ग दिखाएगा।
🙏 प्रार्थना
हे स्वर्गीय पिता, मुझे अपने वचन से बुद्धि प्रदान कर। मुझे सत्य को पहचानने, प्रभु यीशु मसीह की विश्वासयोग्यता से आज्ञा मानने और नम्रता तथा साहस के साथ सेवा करने में सहायता कर। मेरा हृदय तेरे सत्य में स्थिर रख और प्रतिदिन अपने पवित्र आत्मा के द्वारा मेरा मार्गदर्शन कर। आमीन।


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