मन्ना: जब हम पहचान नहीं पाते तब भी परमेश्वर की प्रतिदिन की व्यवस्था पर भरोसा करना सीखना

📖 शास्त्र पाठ
“यह देखकर इस्राएली, जो न जानते थे कि यह क्या वस्तु है, वे आपस में कहने लगे यह तो मन्ना है। तब मूसा ने उनसे कहा, “यह वही भोजनवस्तु है जिसे यहोवा तुम्हें खाने के लिये देता है।”
‭‭निर्गमन‬ ‭16‬:‭15‬ ‭HINOVBSI‬‬

“जब उत्तर हमारी आशा से भिन्न दिखता है, तभी विश्वास सबसे अधिक बढ़ता है।”

— एलेन रेनेयर्ड (ईसाई नर्स और मिशनरी, 1860 का दशक)

रॉबर्ट मॉरिसन (1782–1834), चीन के पहले प्रोटेस्टेंट मिशनरी, ग्वांगझोउ पहुँचे तो उनके पास लगभग कुछ भी नहीं था। मिशन बोर्ड से धन-सहायता वर्ष में केवल एक बार जहाज द्वारा आती थी—और कई बार जहाज़ देर से पहुँचते, लूट लिए जाते, या समुद्र में खो जाते।एक वर्ष तो ऐसा हुआ कि मॉरिसन के पास न भोजन बचा, न धन। फिर भी वे अनुवाद-कार्य में लगे रहे और प्रार्थना करते रहे,

“हे प्रभु, यदि तू मुझे यहाँ लाया है, तो तू मुझे यहीं संभालेगा।”

कई दिनों की भूख के बाद अचानक इंग्लैंड से एक सीलबन्द लकड़ी का बक्सा पहुँचा। पर उस पर लिखा था—“यह स्थानीय चीनी विश्वासियों में बाँटने के लिए है।”

मॉरिसन ने उसे खोलना उचित न समझा, और वे प्रार्थना में लगे रहे, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर अपने ढंग से व्यवस्था करेगा।

(जारी रहेगा…)

To be continued ……

इस्राएल एक सुबह जंगल में उठा तो ओस के नीचे कुछ अनजाना पड़ा था—छोटे, गोल, अत्यंत महीन कण, जैसे रेत पर मोती के बिंदु बिखरे हों।

न कोई सुगन्ध।

न कोई नाम।

न कोई समझ।

पहाड़ियों पर एक ही स्वर गूँज उठा—

“मन हू?” “Man hu?”— “यह क्या है?”

उन्होंने रोटी माँगी थी; पर उत्तर उनके अनुमान जैसा न था। यह छोटी थी। नाज़ुक थी। धरती से बटोरनी पड़ती थी। मेहनत माँगती थी।

और—सबसे बढ़कर—विश्वास माँगती थी।

इस अनोखे भोजन—जिसे आगे चलकर मन्ना (מָן) कहा गया—ने प्रतिदिन गिरकर उन्हें दिखाया कि परमेश्वर की व्यवस्था कितनी भिन्न हो सकती है। उसका स्वाद मधु से मिली हुई पट्टियों जैसा था; और वह या तो उबाला जाता या सेंका जाता। गिनती 11 बताता है कि उसका रंग गंधरस (bdellium) जैसा था—मोती-सा स्वच्छ और उज्ज्वल।

पर सबसे बड़ा चमत्कार भोजन नहीं था—

परमेश्वर का वह पाठ, जो वह उनसे सिखा रहा था।

मन्ना हमें सिखाता है कि परमेश्वर की व्यवस्था कई बार पहचानी नहीं जाती।
इस्राएल ने परिचित रोटी चाही थी; परंतु परमेश्वर ने कुछ बिल्कुल नया भेजा। उन्होंने प्रार्थना की, पर उत्तर उन्हें समझ में न आया—क्योंकि वह उनकी अपेक्षा जैसा न था।

हिब्रानी नाम “मन्ना” स्वयं इस उलझन का अर्थ है—
“यह क्या है?”

हमारे जीवन में भी यही होता है।
परमेश्वर व्यवस्था देता है, पर—
• वह छोटी लगती है
• उसे अपनाने में परिश्रम चाहिए
• वह प्रतिदिन आती है, भण्डार में नहीं
• वह निश्चितता से नहीं, भरोसे से चलाती है
• वह हमारे आराम को नहीं, हमारे विश्वास को बढ़ाती है

व्यवस्था-विवरण 8:3 बताता है कि परमेश्वर उन्हें सिखा रहा था कि वे दिखने वाली वस्तुओं पर नहीं, उसके वचन पर निर्भर होना सीखें।

और जैसे मन्ना आगे चलकर मसीह—स्वर्ग से आई सच्ची रोटी—की ओर संकेत करता था, वैसे ही हमारे जीवन की हर अनपेक्षित व्यवस्था हमें याद दिलाती है:

परमेश्वर विश्वासयोग्य है, चाहे उसकी विश्वासयोग्यता हमारी आँखों को अपरिचित क्यों न लगे।

कहानी का अंत :

दो दिन बाद एक व्यापारी—जो उन्हें मुश्किल से जानता था—दरवाज़े पर आया और बोला,

“मिस्टर मॉरिसन, आज व्यापार करते-करते मेरे मन में अत्यन्त तीव्र इच्छा से आया कि मैं यह आपको दे दूँ।”

उसने एक लिफ़ाफ़ा दिया—जिसमें ठीक उतनी ही राशि थी जिससे मॉरिसन कई महीनों तक चल सकते थे।

मॉरिसन ने बाद में लिखा,

“जब कोई व्यवस्था दिखाई न देती थी, तब परमेश्वर ने व्यवस्था कर दी।”

यह मन्ना का ही एक चित्र था—वह व्यवस्था जो छिपी हुई लगे, देर से आये, या अनपेक्षित लगे… पर आये ठीक परमेश्वर के समय पर।

Source:

J. S. M. Anderson, “The Life and Labours of Robert Morrison” (London, 1842).

Public domain archive link: https://archive.org/details/lifelaboursofro00ande

जब हम आवश्यकता में होते हैं, हम चाहते हैं कि परमेश्वर परिचित और पूर्वानुमानित रीति से दे; पर अक्सर वह “मन्ना” भेजता है—जिसे हम तुरंत पहचान नहीं पाते। हम अवसरों, लोगों, दरवाज़ों, सहायता या आन्तरिक सामर्थ्य को अनदेखा कर देते हैं—क्योंकि वे बहुत साधारण या छोटे से दिखते हैं।

परमेश्वर चाहता है कि हम प्रतिदिन उस पर भरोसा करें, वह जो देता है उसे विश्वास से बटोरे, और यह मानें कि उसका उत्तर भले अनजाना लगे—पर कभी अधूरा नहीं होता।

🙏 प्रार्थना: हे प्रभु, हमें ऐसे नेत्र दे कि हम तेरी व्यवस्था को पहचान सकें, चाहे वह हमारे अनुमान से भिन्न क्यों न हो। हमें प्रतिदिन तुझ पर भरोसा करना सिखा, और तेरी दी हुई कृपा को नम्रता से बटोरना सिखा। तेरे समय पर विश्राम करना और यह विश्वास करना सिखा कि तू हर आवश्यकता में पर्याप्त है। आमीन।


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