“जंगल में इस्राएलियों की सारी मण्डली मूसा और हारून के विरुद्ध बकबक करने लगी। इस्राएली उनसे कहने लगे, “जब हम मिस्र देश में मांस की हांडियों के पास बैठकर मनमाना भोजन करते थे, तब यदि हम यहोवा के हाथ से मार डाले भी जाते तो उत्तम वही था; पर तुम हम को इस जंगल में इसलिये निकाल ले आए हो कि इस सारे समाज को भूखों मार डालो।””
निर्गमन 16:2-3 HINOVBSI
“कृतज्ञता चमत्कारों को याद रखती है; कुड़कुड़ाहट उन्हें मिटा देती है।”
— हन्नाह पीयर्स
1912 में, दक्षिण भारत के दोहनावर ( तमिलनाडु) में सेवकाई कर रही मिशनरी एमी कार्माइकल अत्यन्त कठिन आर्थिक संकट से गुज़र रही थीं। दोहनावर फ़ेलोशिप अनेक बच्चों की देखभाल करती थी जिन्हें मन्दिर-दासत्व (temple slavery) से छुड़ाया गया था। एक सप्ताह तो ऐसा आया कि उनके पास बिल्कुल भी धन न रहा।
न भोजन, न कोई साधन, और न ही किसी सहायता का वचन।
कुछ कार्यकर्ता चिन्तित होकर आपस में धीरे-धीरे कहने लगे,
“हम क्या करेंगे? कल बच्चों को क्या खिलाएँगे?”
इस्राएल का मार्ग हमारे अपने हृदयों के उतार-चढ़ाव जैसा है। अभी कुछ समय पहले मारा में परमेश्वर ने कड़वे जल को मधुर कर दिया—निराशा के बीच यह दया का चमत्कार था। फिर वह उन्हें एलीम ले आया—बारह सोतों और सत्तर खजूरों का स्थान। विश्राम का स्थल, परमेश्वर की कोमल छाया।
परन्तु जैसे ही वे सीन के जंगल में प्रवेश किए, उनका गीत आह में बदल गया। उनका विश्वास उतनी ही शीघ्रता से घट गया जितनी शीघ्रता से उनके भण्डार घटे।भूख की पीड़ा उनकी स्मृति से अधिक ज़ोर से बोलने लगी।उन्होंने ऐसा मान लिया मानो वे भूख से मर ही जाएँगे—जबकि ऐसा नहीं हुआ था; भूख से किसी की मृत्यु तक नहीं हुई थी।

फिर भी—वे कुड़कुड़ाए। उन्हें मिस्र दासत्व का स्थान नहीं, बल्कि “मांस के हाँड़े” और “रोटी की परिपूर्णता” का स्थान लगा। भूतकाल उनकी कल्पना में चमक उठा और भविष्य में परमेश्वर का वचन धुँधला पड़ गया। डर ने उन्हें यह कहने पर उकसाया कि मूसा और हारून उन्हें जंगल में मरने को लाए हैं—यह सत्य से नहीं, शिकायत से जन्मा आरोप था।
परिवर्तन स्पष्ट है:
मारा का चमत्कार → एलीम का विश्राम → जंगल में कुड़कुड़ाहट। यह केवल इस्राएल की कथा नहीं—हमारी भी है।
कुड़कुड़ाहट मुँह से नहीं—हृदय से प्रारम्भ होती है।
जब हम यह भूल जाते हैं कि प्रभु ने अभी हमारे लिये क्या किया—कैसे चंगा किया, कैसे मार्ग खोला, कैसे रक्षा की—तब हम वर्तमान असुविधा को बढ़ा-चढ़ाकर देखने लगते हैं।
इस्राएल की समस्या भूख नहीं थी—भय था।
जिस बात की अभी घटी भी नहीं थी, उसका भय।
बीते हुए समय का बढ़ा-चढ़ा सौन्दर्य।
और अगुवों के प्रति संदेह।
कुड़कुड़ाता हृदय सदैव—
1️⃣ बीते समय को तोड़-मरोड़ कर देखता है
2️⃣ वर्तमान चमत्कारों को अनदेखा करता है
3️⃣ भविष्य के प्रति समय से पहले डरता है
4️⃣ ईश्वर की भलाई पर सन्देह करता है
मराह और एलीम उनके विश्वास को दृढ़ करने के लिये थे, परन्तु उनके हृदय कुड़कुड़ाहट की ओर लौट गए।
हम भी ऐसे ही हैं।
जल के मधुर होने पर आनन्दित होते हैं।
एलीम की छाया में विश्राम करते हैं।
परन्तु जहाँ प्रभु भरोसा माँगता है—हम घण्टों में उसकी विश्वासयोग्यता भूल जाते हैं।
जंगल परमेश्वर की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं—हमारे विश्वास का विद्यालय है।
कहानी का अन्त:
एमी ने धीरे से स्मरण कराया,
“क्या वह कभी हमें छोड़ चुका है?”
उन्होंने सबको घबराने या कुड़कुड़ाने से मना किया और पिछले असंख्य प्रबन्धों को याद करने को कहा।उसी संध्या, बच्चों के सोने से पहले, इंग्लैण्ड से एक पत्र आया।
उसमें एक भेंट थी—एक-एक रुपये तक उतनी ही जितनी आवश्यकता थी!

दाता ने लिखा कि कई सप्ताह पहले ही प्रभु ने उसके मन में “तुरन्त” सहायता भेजने का भार रखा था, बिना यह जाने कि दोहनावर ( तमिलनाडु) में कोई घोर आवश्यकता है।
एमी ने पत्र को थामा और कहा,
“देखो, हमारा पिता अपने बच्चों को अंतिम घड़ी में भी नहीं भूलता।”
हमें अपने हृदय जाँचने चाहिए—
क्या हम परमेश्वर की भलाई शीघ्र भूल जाते हैं?
क्या हम छोटी-सी परेशानी को पहाड़ बना देते हैं?
क्या हम बीते समय को सजाकर देखते हैं, जबकि वह हमें दास बनाता था?
हमें स्मरण रखना चाहिए—
• जो परमेश्वर कड़वे को मधुर करता है, वही अभाव में टिका भी सकता है।
• जिसने हमें एलीम पहुँचाया, वह जंगल में भी मार्ग दिखाएगा।
• हम त्यागे नहीं गए—हम गढ़े जा रहे हैं।
आओ हम कुड़कुड़ाहट की नहीं, विश्वास की राह चुनें। क्योंकि कृतज्ञता उठाती है, और कुड़कुड़ाहट अन्धा कर देती है।
🙏 प्रार्थना: “हे प्रभु, हमें अपने चमत्कारों को स्मरण रखना सिखा।अपनी भलाई में विश्राम करने दे, और जंगल में तुझ पर भरोसा करना सिखा।हमारे भय को विश्वास में, और कुड़कुड़ाहट को धन्यवाद में बदल दे। जैसे तूने एलीम तक पहुँचाया, वैसे ही तू जंगल में भी हमें सम्भाले। आमीन।”


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